मदन गुप्ता सपाटू,
दीवाली पूजन का शुभ समय सायंकाल  
रात्रि 19.10 से 22.30 तक रहेगा जिसमें दीपदान, महालक्ष्मी, गणेश पूजन, बही खाता पूजन, धर्म तथा गृहस्थलों , व्यापारिक सस्थानों में दीप प्रज्जवलन, परिचितों या आश्रितों को भेंट अथवा मिष्ठान आदि वितरण का शुभ समय रहेगा।
शुभ चौघड़िया – 10.52 से 12.12 तक
लाभ चौघड़िया-16.10 से 17.30 तक
महा निशीथ काल- 22.52 से 25.31 तक परंतु 24.12 तक ही शुभ समय।
इस बार अमावस्या दीवाली की रात्रि 09.32 मिनट तक ही  रहेगी। 
 
  1.  घर की साफ सफाई करें । प्रवेश द्वार पर घी और सिंदूर से ओम ्या स्वास्तिक का चिन्ह बनाएं।
  2.  सायंकाल खीलें ,बतासे,अखरोट,पांच मिठाई,कोई फल पहले मंदिर में दीपक जला कर चढ़ाएं।
  3.  दीवाली वाले दिन मिटट्ी या चांदी की लक्ष्मी जी की मूर्ति खरीदें। एक नया झाड़ू लेकर किचन में रखें ।
  4.  लक्ष्मी पूजन करें
  5.  बहियों ,खातों, पुस्तकों,पैन,स्टेशनरी, तराजू ,कंप्यूटर या वो वस्तु जिसे आप रोजगार के लिए प्रयोग करते हैं उनकी पूजा करें।
दीवाली पूजन की सामान्य विधि
  स्नान करें,पूजा के लिए उत्तर या पूर्व दिशा की ओर मुख रखें और कोई दरी या कंबल बिछा लें । द्वार पर रंगोली बना लें।थाली में अश्ट दल बना के नव ग्रहों की आकृति आटे से बना के ,लक्ष्मी जी की प्रतिमा स्थापित करें।आवाहन करें।अक्षत ,पुश्प,अश्टगंध युक्त जल अर्पित करें। दिशा रक्षण के लिए बाएं हाथ से पीली सरसों लेके दाएं हाथ में ढक के चारों दिशाओं में फेंकें।
   गणेश जी, लक्ष्मी जी व सरस्वती जी की मूर्तियां रखें।चौकी पर लाल वस्त्र बिछा के थाली रखें।क्लश,धूप दीप रखें। क्लश में जल भर कर  उसमें गंगाजल , थोड़े से चावल, एक चांदी या प्रचलित सिक्का डाल दें । क्लश पर आम के 5 या 7 पत्ते रखें।  पानी वाले नारियल पर 3 या 5 चक्र कलावा या मौली बांधकर क्लश पर रख दें। गणेश जी व लक्ष्मी जी तथा श्रीयंत्र रखें। केसर, चंदन से स्वास्तिक बना के गणेश जी, लक्ष्मी जी व  श्रीयंत्र  को स्थापित करें। लक्ष्मी जी को गणेश जी के दाएं रखें। गणेश जी पर अक्षत-पुश्प चढ़ाएं। पंचामृत-दूध ,दही,घी,शहद व शक्कर से स्नान कराएं फिर जल डालें। फिर मौली,जल,चंदन,कुंकुम,चावल,पुश्प,दूर्वा,सिंधूर ,रौली इत्र,धूप दीप,मेवे प्रसाद फल पान,सुपारी लौंग ,इलायची व द्रव्य – 11 रुपये बारी बारी चढ़ाएं। दूध,दही,घी,मधु,शक्कर पंचामृत,चंदन,गंगा जल से प्रतिमा को  स्नान करवाएं।वस्त्र,उप वस्त्र,आभूशण,चंदन,सिंदूर,कंुकुम,इत्र ,फूल आदि समर्पित करें।लक्ष्मी जी की प्रतिमा के हर अंग को पुश्प से पूजें।
 
इस मंत्र का जाप करते जाएं-
ओम् श्रीं हृीं श्रीं महालक्ष्म्यैे नमः
तेल का एक चौमुखी दीपक और 21 छोटे दीपक जलाएं।आचमन करें। प्रथम मूर्तियों पर तिलक लगा कर फिर अपने व अन्य सदस्यों के कलावा बांधें , तिलक लगाएं।गुरु तथा लक्ष्मी जी का ध्यान करें ।  मूर्तियों पर चावल, पान, सुपारी, लौंग, फल , कलावा,फल , मिठाई, मेवे आदि चढ़ाएं। अक्षत-पुश्प दाहिने हाथ में लेके पृथ्वी तथा नव ग्रहों- सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु, केतु, कुबेर देवता, स्थान देवता, नगर खेड़ा वास्तु देवता , कुल देवी या देवता का आवाहन करें। हाथ जोड़ के गणपति व अन्य देवी देवताओं को नमस्कार करें। संकल्प लें। 
 
देहली पूजनः
प्रवेश द्वार पर सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं या ओम गणेशाय नमः या शुभ लाभ लिखें।दिया जलाएं।
लेखनी पूजन
पैन,स्टेशनरी,कंप्यूटर,कैल्कुलेटर,बही,खाते आदि पर केसर युक्त चंदन से स्वास्तिक बनाएं ,मौली लपेटें,सरस्वती जी का ध्यान करें।धूप दीप करें।विद्यार्थी अपनी पुस्तकों,नोट बुक पर भी ऐसा ही करें। जो छात्र कंपीटीशन में बैठ रहे हैं या परीक्षा दे रहे हों ,हम से भी  कलम पूजन इस अवसर पर करा सकते हैं।
कुबेर पूजन
तिजोरी,कैश बाक्स,लाकर आदि पर स्वास्तिक चिन्ह बना के कुबेर को नमस्कार करें और धन की कामना करें।
तुला ,मानक,कंप्यूटर , नोट काउंटिंग मशीन पर सिंदूर से स्वास्तिक बनाएं , शुभ लाभ लिखें ,मौली लपेटें, पूजन करें
दीप माला
5 या 7 या 11 दीपक प्रज्जवलित करें।लक्ष्मी गणेश जी की आरती करें। आरती की कैसेट, सी.डी या पैन ड्राइव का प्रयोग भी कर सकते हैं । इन दीपकों को घर के कोने कोने में रखें।एक मंदिर मे जला आएं।
प्रसाद बाटंे
खीलें , गुड़ के बने खिलौने ओर सूखे मेवे।
श्री यंत्र अभिमंत्रण , किसी यंत्र का निर्माण व ल्ेाखनी पूजन विशेष मुहूर्त में करें 
हवन करें –   पूजा के पशचात् हवन एवं आरती कर सकते हैं।
विशेष -ः दीवाली पर जलता हुआ दीपक भूल से भी न बुझाएं। 
 
दीवाली के दिन विभिन्न समस्याओं के लिए ये प्रयोग भी कर सकते हैं-
अपना पर्स बदल लें। उसमें लाल रंग के लिफाफे में एक कागज पर अपनी मनोकामना जैसे विवाह , नौकरी, धनागमन आदि लिख कर रखें । 
1.दद्रिता निवारणः- 21 काले,अभिमंत्रित हकीक जमीन में गाड़ दें।-शनिवार
2.आर्थिक उन्नतिः- 27 पीले अभिमंत्रित हकीक, घर के मंदिर में पीले कपड़े में बांध के रखें,-वीरवार 
3.विजय ,परीक्षा,प्रतियोगिता ,कोर्ट केस: 11 हरे  हकीक दुर्गा /माता के  मंदिर में रख आएं ।-मंगलवार या बुधवार  
4- घर क्लेश -दो नीले हकीक घर के किसी कच्चे भाग में दबा दें।
5. धन वृद्धि -एक लाल हकीक तिजोरी में रखें।
6.- बच्चे को नजर  /डरना- एक नीला हकीक चांदी के लाकेट में बनवा के पहनाएं-शनिवार 
7.- संतान की सुख समृद्धि- 19 पीले हकीक उजाड़ जगह फेंक दें ।
 
कुछ अन्य उपाय व मंत्र
ऋण मुक्तिः स्फटिक की माला से  इस मंत्र का जाप करें।
ओम् नमो हृीं श्रीं क्रीं श्रीं क्लीं श्रीं लक्ष्मी मम गृहे धनं चिन्ता दूर करोति स्वाहा !!
विद्या हेतुः ओम् ऐं क्रीं ऐं ओम्  का 21 बार जाप करें ।
नौकरी प्राप्तिः ओम् हृीं कार्य सिद्धि ओम नमः का जाप पंचपर्व में करें ।
शत्रु शमन के लिए: ओम क्लीं हृीं ऐं शत्रुनाशाय फट् का तीन दिन जाप एक एक माला करें।
कोर्ट केसःओम् हूं हूं शत्रुस्तंभनं ठः ठः स्वाहा का 31 बार जाप करें ।
 
दीवाली पर कुछ उपाय
ऋण न लौटाने वाले का नाम कोयले की राख या काजल से भोजपत्र पर लिख कर एक पत्थर के नीचे दबा दें।
धन वृद्धि हेतु ,चांदी की गोल डिब्बी में , शहद व नागकेसर भरकर धन स्थान पर रख दें।
घर की नजर उतारने के लिए,एक नारियल और खीर हाथ में लेकर पूरे घर की परिक्रमा करके प्रवेश द्वार पर तोड़ कर खीर वहीं रख दें।
चौथा दिन- गोवर्धन पूजा , अन्नकूट एवं पंजाब में विश्वकर्मा दिवस- 8 नवंबर ,गुरुवार,
 
ऽ अन्नकूट पर क्या करें ?
ऽ इस दिन चांद नहीं देखना चाहिए।प्रातः तेल मल कर नहाएं। आज के दिन मंदिर में अन्न दान करने से घर में खाद्य पदार्थो की कमी नहीं होती।समृद्धि की प्रतीक गाय का  पुूजन करें ,बैल या अन्य पालतू पशुओं को तेल मल कर नहलाएं।गायों को मिश्ठान दें।सायं काल दैत्यराज  बलि का पूजन कर सकते हैं।
 
पांचवें दिनः यम द्वितीया- भाई दूज – 9 नवंबर -शुक्रवार,
भाई दूज (यम द्वितीया) कार्तिक शुक्ल पक्ष की द्वितीया को मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार कार्तिक शुक्ल पक्ष में द्वितीया तिथि जब अपराह्न (दिन का चौथा भाग) के समय आये तो उस दिन भाई दूज मनाई जाती है।

यदि दोनों दिन अपराह्न के समय द्वितीया तिथि लग जाती है तो भाई दूज अगले दिन मनाने का विधान है। इसके अलावा यदि दोनों दिन अपराह्न के समय द्वितीया तिथि नहीं आती है तो भी भाई दूज अगले दिन मनाई जानी चाहिए। ये तीनों मत अधिक प्रचलित और मान्य है।
एक अन्य मत के अनुसार अगर कार्तिक शुक्ल पक्ष में जब मध्याह्न (दिन का तीसरा भाग) के समय प्रतिपदा तिथि शुरू हो तो भाई दूज मनाना चाहिए। हालांकि यह मत तर्क संगत नहीं बताया जाता है।
भाई दूज के दिन दोपहर के बाद ही भाई को तिलक व भोजन कराना चाहिए। इसके अलावा यम पूजन भी दोपहर के बाद किया जाना चाहिए। 

 
भाई दूज या यम द्वितीया पर क्या करें ? 
ऽ सुविधानुसार ,गंगा या यमुना में स्नान कर सकते हैं।
ऽ भाई की दीर्घायु के लिए पूजा अर्चना प्रार्थना करें।
ऽ भाई ,बहन के यहां जाए और तिलक कराए।  भ्राता श्री ,बहना के यहां ही भोजन करे। इस परंपरा से आपसी सौहार्द्र बढ़ता हैै। आपसी विवादों तथा वैमनस्य में कमी आती है। भाई कोई शगुन,आभूषण या गीफट बदले में दे। बहन भी भाई को मिठाई और एक खोपा देकर विदा करे।
भाई दूज के शुभ मुहूर्त
भाई दूज, द्वितीया, 9 नवंबर 2018, (शुक्रवार)
भाई दूज तिलक का समय :13:10:02 से 15:20:30 तक
अवधि :2 घंटे 10 मिनट।
छठे दिन 10 नवंबर को  क्या करें ?
ःधनतेरस पर  दहलीज पर रखे दीपक को विसर्जित कर दें या किसी पीपल के नीचे रख आएं
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भारतीय परंपराओं का वैज्ञानिक आधार
मदन गुप्ता ‘सपाटू’
 
दीवाली पर ही क्यों बांटी जाती हैं खीलें , होली,दशहरे या लोहड़ी पर क्यों नहीं ?
हमारे रीति रिवाजों, धार्मिक आस्थाओं तथा परंपराओं का सदा ही वैज्ञानिक आधार रहा है और इसे किसी न किसी धार्मिक अनुष्ठान से जोड़ दिया गया । होली पर रंग डालना,विजयदशमी पर जौ उगाना तथा घर में गन्ना लाना,लोहड़ी पर आग जलाना व रेवड़ियां बांटना मात्र परंपराएं ही नहीं हैं अपितु इसके पार्श्व में कई वैज्ञानिक कारण रहे हैं जिसका मानव शरीर पर विशेष प्रभाव पड़ता है। क्या आप होली पर खीलें बांटेंगे? दीवाली पर तिल की रेवड़ियां बांटते देखा है कभी? दशहरे पर रंग डालना सुना है कभी? यह इस लिए कि सभी मान्यताओं के पीछे कोई न कोई ठोस आधार होता है और वह भी विज्ञान से जुड़ा हुआ जिसे किसी ने प्रचारित करने का कष्ट नहीं किया।
दीवाली पर दीपमाला,लक्ष्मी पूजन तथा अन्य खुशियां मनाने के साथ साथ मिठाई बांटने का रिवाज भारत में प्राचीन काल से रहा है। इस परंपरा में खीलें बताशे और एक मेवा देने की प्रथा रही है।ये तीन चीजें वितरण में आवश्यक मानी जाती रही हैं। बदलते समाज में दीवाली पर गीफट देने की परंपरा में भले ही आज स्वर्ण आभूषण, गृहपयोगी वस्तुएं, ड््राई फ्रूट के डिब्बे,सूट्स,कपड़े,एयर टिकट, रिश्वत आदि देने का रिवाज चल पड़ा हो पर पारंपरिक तौर पर आज भी हम खीलें, गुड़ या चीनी के बताशे तथा एक मेवा अवश्य प्रशाद के तौर पर , मंदिर में चढ़ाते हैं या आपस में बांटते हैं। इन तीन आइटम का ही विशेश महत्व है।
दीवाली का पर्व ,बरसात के एक दम बाद ही आ जाता है। वर्षा ऋतु में धरती का जल विशाक्त हो जाता है। बरसात में अक्सर हमें गंदा पानी पीना पड़ता है जिससे शरीर में कई प्रकार के रक्त विकार हो जाते हैं। गैस्ट्रोएंट्राइटस ,फोड़े फुंसियां होना, वाइरल हो जाना अक्सर बरसात के आसपास वार्षिक फीचर रहते हैं। 
खीलेंा में विषाक्त पदार्थ शोषित करने  की अद्भुत क्षमता होती है।इसकी प्राकृतिक सरंचना ही कृत्रिम स्पंज या थर्मोकोल की तरह होती है जो तरल पदार्थ सोख लेता है। वजन में हल्का होने के कारण कम भार में अधिक चढ़ता है। परिवार में अक्सर दीवाली के 15 दिनों तक किसी न किसी रुप में इसे खाया जाता है। कभी दूध के साथ ,कभी गुड़ के साथ तो कभी अखरोट के साथ। लगभग 15 से 20 दिनों में खीलें शरीर में बरसात के दौरान एकत्रित हुए विषाक्त पदार्थेां  को मलद्वार से बाहर निकाल देती है और जब हम बताशे या गुड़ के खिलौने साथ साथ खा रहे होते हैं तो गुड़ शरीर में रक्त साफ कर रहा होता है। अखरोट बादाम, काजू या कोई भी मेवा हमारे शरीर को  आने वाली सर्दी का सामना करने के लिए गर्मी व उर्जा प्रदान करता है। इस प्रकार खीलें बताशों व ड्राई फ्रूट का घर घर वितरण हमारे आयुर्वेद एवं विज्ञान की एक श्रेष्ठ सोची समझी परंपरा है ताकि हमारे समाज में सभी नागरिक निरोग रहें।
यही नहीं भारतीय सोच विश्व कल्याण की है। सरबत दा भला, सर्वेसन्तु सुखि…… हमारा दर्शन है। हर मानव का कल्याण हो इसीलिए हमारी परंपरा में मंदिरो गुरुद्वारों में प्रशाद व लंगर की व्यवस्था की गई है।भूखे को भोजन, आश्रय, दान, सहायता मिले इसके लिए हर समर्थ नागरिक यहां दान स्वरुप क्षमतानुसार योगदान करता रहे और देश के नागरिक व देश शकितशाली बनेा । 
इसी परंपरानुसार दीपावली पर सबसे पहले प्रशाद में खीले मंदिर में चढाई जाती हैं और वहां से जनसाधारण में प्रशाद-दवाई के रूप में वितरित की जाती है। प्रशाद मंदिर में ही खाने का नियम है इसलिए किसी न किसी रुप में यह खाई जाती है और हम बिना जाने ही निरोग हो जाते है। यही नहीं मंदिर में चरणामृत के रुप में जल में तुलसी का पत्ता डाल के देने की परंपरा है। यह भी निर्देश दिया जाता है कि चरणामृत गटक जाओ। इसके पीछे भी वैज्ञानिक कारण है। तुलसी के गुणों से सभी परिचित हैं। रोज प्रसाद के रुप में जब यह मंदिर के माध्यम सेा शरीर में जाती है तो निरोग बनाती है। गटकने के लिए इस लिए कहा जाता है क्योंकि तुलसी में विद्यमान कुछ केमीकल दातेां का एनेमल खराब कर देते हैं अतः इसे चबाना नहीं चाहिए। 
इसी प्रकार दही से निर्मित चरणामृत भी एक पैकेज होता है । इसे पंचगव्य कहा जाता है और हमारे हर धार्मिक अनुष्ठान में इसे बांटा जाता है। पंचगव्य में गौ मूत्र,मधु, गाय का दूध, तुलसी तथा गाय के दूध की दही व पंच मेवे डाले जाते हैं । ये सभी चीजें शरीर को रोग, इन्फैक्शन आदि से दूर रखती है। अब आप ही सोचें कि भारतीय पंरंपराएं कितने वैज्ञानिक शोध के पश्चात क्रियान्वयन की गई होंगी !
MADAN GUPTA ‘SPATU’
Author & Astrologer
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