मदन गुप्ता सपाटू, ज्योतिर्विद्, मो – 98156 19620

अधिकतर कृष्ण जन्माष्टमी दो अलग-अलग दिनों पर हो जाती है. जब-जब ऐसा होता है, तब पहले दिन वाली जन्माष्टमी स्मार्त सम्प्रदाय के लोगों के लिए और दूसरेदिन वाली जन्माष्टमी वैष्णव सम्प्रदाय के लोगों के लिए होती है. जो कि इस वर्ष भी 2 दिन पड़ रही है. जिसमे प्रथम दिन अर्थात 2 सितम्बर को स्मार्त की होगी और 3सितम्बर को वैष्णव संप्रदाय की मनाई जाएगी.

पुराणों के अनुसार  भगवान कृष्ण का जन्म भाद्रकृष्ण अष्टमी तिथि बुधवार , रोहिणी नक्षत्र व बृष राशि में अभिजीत मुहूर्त के अधीन हुआ है। ज्योतिषीय योगों के अनुसार यह एक दुर्लभ संयोग होता है, इसीलिए भगवान कृष्ण पूरे संसार में अपनी लीलाओं, गीता ज्ञान और कर्म प्रधान जीवन के लिए आज भी उतने ही सार्थक हैं जितने 5000 साल पूर्व थे।

2 सितंबर रविवार की सायं सप्तमी सायं 8 बजकर 48 मिनट तक रहेगी। उसके बाद, अष्टमी तिथि आरंभ हो जाएगी तथा रोहिणी नक्षत्र व बृष राशि भी लग जाएगी।

चूंकि भगवान कृष्ण का जन्म रात्रि ठीक 12 बजे माना गया है अतः अर्द्धरात्रि व्यापिनी में ही व्रत रखने को शास्त्रसम्मत माना गया है। कई पुराणों में भी इसी नियम को माना गया है। अतः गृहस्थ लोग अर्थात आम भक्तगण एवं श्रद्धालुजन 2 सितंबर  को ही व्रत रखें ।

इस बार 2 सितंबर, रविवार को स्मार्त अर्थात गृहस्थी लोग जन्माष्टमी मनाएंगे क्योंकि  इस दिन कई दुर्लभ योग हैं । इसलिए, इसी समय, भगवान के निमित्त व्रत, बालरुप पूजा, झूला झुलाना, चंद्र का अर्घ्य, दान, जागरण, कीर्तन आदि का विधान होगा। 

अगले दिन 3 सितंबर, सोमवार  को, वैष्णव यह जन्मोत्सव  इसी दिन मनाएंगे। परंपरानुसार एवं स्थानीय परिस्थितिवश मथुरा व गोकुल में हर बार की तरह भगवान कृष्ण के जन्म पर नन्दोत्स्व अगले दिन मनाया जा रहा है। भारत के कई नगरों में मथुरा की परंपरा के अनुसार चला जाता है परंतु शुद्ध ज्योतिष के आधार पर ही व्रत एवं महोत्सव मनाने का अपना ही महत्व एवं सार्थकता रहती है। 

 

क्या है स्मार्त तथा वैष्णव? क्यों रहता है दो दिनों का संशय ?

वेद, श्रुति-स्मृति, आदि ग्रंथों को मानने वाले धर्मपरायण लोग स्मार्त कहलाते हैं। प्रायः सभी गृहस्थी स्मार्त कहलाते हैं। जबकि वे लोग जिन्होंने किसी प्रतिष्ठित  वैष्णव संप्रदाय के गुरु से दीक्षा ग्रहण की हो, दीक्षित हों, कण्ठमाला धारण की हो, किसी प्रकार का तिलक लगाते हों, ऐसे भक्तजन वैष्णव कहलाते हैं। 

गृहस्थ जीवन वाले वैष्णव संप्रदाय से जन्माष्टमी का पर्व मनाते हैं और साधु संत स्मार्त संप्रदाय के द्वारा मनाते हैं. स्मार्त अनुयायियों के लिए, हिंदू ग्रन्थ धर्मसिंधु औरनिर्णयसिंधु में, जन्माष्टमी के दिन को निर्धारित करने के लिए स्पष्ट नियम हैं. जो वैष्णव सम्प्रदाय के अनुयाई नहीं हैं, उनको जन्माष्टमी के दिन का निर्णय हिंदू ग्रंथमें बताए गए नियमों के आधार पर करना चाहिए.

इस अंतर को समझने के लिए एकादशी उपवास एक अच्छा उदाहरण है. एकादशी के व्रत को करने के लिए, स्मार्त और वैष्णव सम्प्रदायों के अलग-अलग नियम होते हैं.ज्यादातर श्रद्धालु एकादशी के अलग-अलग नियमों के बारे में जानते हैं लेकिन जन्माष्टमी के अलग-अलग नियमों से अनभिज्ञ होते हैं. अलग-अलग नियमों की वजहसे न केवल एकादशी के दिनों बल्कि जन्माष्टमी के दिनों में एक दिन का अंतर होता है.

 

वैष्णव और स्मार्त संप्रदाय की जन्माष्टमी के नियम

वैष्णव धर्म को मानने वाले लोग उदया तिथि को प्राथमिकता देते हैं. उदया तिथि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र को प्राथमिकता देते हैं और वे कभी सप्तमी तिथि केदिन जन्माष्टमी नहीं मनाते हैं. वैष्णव नियमों के अनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन अष्टमी /नवमी तिथि पर ही पड़ता है.

जन्माष्टमी का दिन तय करने के लिए, स्मार्त धर्म द्वारा अनुगमन किए जाने वाले नियम अधिक जटिल होते हैं. इन नियमों में निशिता काल को, जो कि हिंदू अर्धरात्रिका समय है, को प्राथमिकता दी जाती है. जिस दिन अष्टमी तिथि निशिता काल के समय व्याप्त होती है, उस दिन को प्राथमिकता दी जाती है. इन नियमों में रोहिणीनक्षत्र को सम्मिलित करने के लिए कुछ और नियम जोड़े जाते हैं.

जन्माष्टमी के दिन का अंतिम निर्धारण निशिता काल के समय, अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र के शुभ संयोजन के आधार पर किया जाता है. स्मार्त नियमों केअनुसार हिंदू कैलेंडर में जन्माष्टमी का दिन हमेशा सप्तमी अथवा अष्टमी तिथि के दिन पड़ता है.

2 सितम्बर को निशीथ काल में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र मिल रहा है जो कि स्मार्त संप्रदाय वालों के लिए है. 3 सितम्बर को अष्टमी तिथि एवं रोहिणी नक्षत्रउदया तिथि में मिल रही है. अतः वैष्णव संप्रदाय वालों को इस दिन मनानी चाहिए और इसी दिन व्रत करना चाहिए। 

 

व्रत कब और कैसे  रखा जाए?

व्रत के विषय में इस बार किसी प्रकार भी भ्रांति नहीं हैं। फिर भी कई लोग, अर्द्धरात्रि पर रोहिणी नक्षत्र का योग होने पर सप्तमी और अष्टमी पर व्रत रखते हैं। कुछ भक्तगण उदयव्यापिनी अष्टमी पर उपवास करते हैं। 

 शास्त्रकारों ने व्रत -पूजन, जपादि हेतु अर्द्धरात्रि में रहने वाली तिथि को ही मान्यता दी। विशेषकर स्मार्त लोग अर्द्धरात्रिव्यापिनी अष्टमी को यह व्रत करते हैं। पंजाब, हरियाणा, हिमाचल,चंडीगढ़ आदि में  में स्मार्त धर्मावलम्बी अर्थात गृहस्थ लोग गत हजारों सालों से इसी परंपरा का  अनुसरण करते हुए सप्तमी युक्ता अर्द्धरात्रिकालीन वाली अष्टमी को व्रत, पूजा आदि करते आ रहे हैं। जबकि मथुरा, वृंदावन सहित उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में उदयकालीन अष्टमी के दिन ही कृष्ण जन्मोत्सव मनाते आ रहे हैं। भगवान कृष्ण की जन्मस्थली मथुरा की परंपरा को आधार मानकर मनाई जाने वाली जन्माष्टमी के दिन ही  केन्द्रीय सरकार अवकाश की घोषणा करती है। वैष्णव संप्रदाय के अधिकांश लोग उदयकालिक नवमी युता जन्माष्टमी व्रत हेतु ग्रहण करते हैं।

सुबह स्नान के बाद ,व्रतानुष्ठान करके ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र जाप करें । पूरे दिन व्रत रखें । फलाहार कर सकते हैं। रात्रि के समय ठीक बारह बजे, लगभग अभिजित मुहूर्त में भगवान की आरती करें। प्रतीक स्वरुप खीरा फोड़ कर , शंख ध्वनि से  जन्मोत्सव मनाएं। चंद्रमा को अर्घ्य देकर नमस्कार करें । तत्पश्चात मक्खन, मिश्री, धनिया, केले, मिष्ठान आदि का  प्रसाद ग्रहण करें और बांटें। अगले दिन नवमी पर नन्दोत्सव मनाएं।  

 

भगवान कृष्ण की आराधना के लिए आप यह मंत्र पढ़ सकते हैं-

ज्योत्स्नापते नमस्तुभ्यं नमस्ते ज्योतिशां पते!

नमस्ते रोहिणी कान्त अर्घ्य मे प्रतिगृह्यताम्!!

संतान प्राप्ति के लिए – 

इस की इच्छा रखने वाले दंपत्ति, संतान गोपाल मंत्र का जाप पति -पत्नी दोनों मिल कर  करें, अवष्य लाभ होगा।

मंत्र है- देवकी सुत गोविंद वासुदेव जगत्पते!

देहिमे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः!!

दूसरा मंत्र-

! क्लीं ग्लौं श्यामल अंगाय नमः !!

 

विवाह विलंब के लिए मंत्र है- 

ओम् क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्ल्भाय स्वाहा।

इन मंत्रों की एक माला अर्थात 108 मंत्र कर सकते हैं।

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