अटल बिहारी वाजपायी जब 1996 में पहली बार प्रधानमंत्री बने थे तो सरकार गठित करने के लिए बनाऐ राष्ट्रीय डेमोक्रेटिक गठजोड में उनका सबसे पहला साथी शिरोमणी अकाली दल बना था। अकाली दल के प्रधान प्रकाश सिंह बादल ने दिल्ली जाकर उनको आधार शर्त सहयोग देने का वचन दिया था। हालाँकि तब अटल बिहारी वाजपायी सदन में अपना बहुमत साबित नहीं कर सके और सरकार सिर्फ़ 13 दिनों में ही गिर गई, परन्तु 1998 में जब फिर से मतदान हुई तो अकाली दल ने अपने छह संसदों का उनको सहयोग दिया। सरकार भी सिर्फ़ 13 महीने चली और 1999 में फिर 5 संसदों का सहयोग दिया।

गट्ठ -जोड़ सरकारें चलाने का सबसे पहला मौका अटल बिहारी वाजपायी के हाथ ही आया। हालाँकि यह वह दौर था, जब दूसरी पार्टियाँ भारतीय जनता पार्टी के साथ जाने को तैयार नहीं होती थीं। परन्तु, पंजाब की शिरोमणी अकाली दल ने इस गतिरोध को तोड़ा और आधार शर्त समर्थन देकर सबसे पहले पहल की।

प्रकाश सिंह बादल के साथ संबंधों के कारण ही 1999 में जब खालसा पंथ का 300 साला स्थापना दिन मनाने की बात आई तो न सिर्फ़ प्रधानमंत्री इस समारोह में शामिल हुए, बल्कि 300 करोड़ रुपए देने का भी ऐलान किया। श्री आनन्दपुर साहब में बना विरासत–ए–खालसा बनाने का ऐलान भी इस समारोह में हुआ था। बात चाहे बठिंडा में रिफायनरी स्थापित करने की थी या फिर पाकिस्तान के साथ बने गतिरोध को तोड़ने की, वाजपायी हमेशा आगे बढ़कर यह काम करते रहे, जिसका फ़ायदा पंजाब को मिला।

1999 के सितम्बर महीने में जब न्यूयार्क में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाश शरीफ़ के साथ उनकी मीटिंग हुई तो दोनों देशों के लोगों के एक–दूसरे के देश में बनी हुई रिश्तेदारियाँ में जाने की माँग को पूरा करने के लिए वाजपायी ने ही बस चलाने का सुझाव दिया था। जिसको उन्होंने पूरा भी किया। यह बस आज भी दोनों देशों में चल रही है।

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